८ फरवरी १९६३ को जन्मे मोहन साहिल आज साहित्य के क्षेत्र में चर्चित कवि के रूप में अपनी जगह बना चुके हैं ।हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से मात्र २५ किलो मीटर की दुरी पर स्थित एक छोटे से क़स्बे भेखलटी में जन्में और पले बढे मोहन साहिल देखने में जितने साधारण हैं इनकी कविता उतनी ही गंभीर और गहरे उतरने का माद्दा रखती है। मोहन साहिल एक पत्रकार भीं हैं और इनकी पत्रकारिता का सृजनात्मक पक्ष भी इनके सफल साहित्यकार होने का प्रमाण है। मोहन जैसा लिखते हैं वेसा ही जीवन भी जीते हैं। इनके इसी ताल-मेल के कारण ही इन्हें पहले काव्य-संग्रह " एक दिन टूट जायेगा पहाड़" के प्रकाशित होते ही राज्य स्तरीय पुरस्कार से प्रमाण किया गया।देश की ऐसी शायद ही कोई शीर्ष साहित्यिक पत्रिका या पत्र होगा जिसमें मोहन साहिल की कविताए न प्रकाशित हुई हों। देश के हिन्दी साहित्य जगत में मोहन साहिल ने हिमाचल प्रदेश का नाम रोशन किया है। (प्रकाश बादल)

Wednesday, 22 October 2008

कविता

मोहन साहिल की कवितायें
बच्चे

खेलना चाहते हैं बच्चे

मिटटी पत्त्थर और पानी से

कपड़े गंदे हो जाने के भय से

हमने थमाए कृत्रिम खिलौने
बच्चे दौड़ना चाहते हैं

ताज़ा हरी घास पर

सूंघना चाहते हैं ताज़ा फूलों की सुगंध

कलाबाजियां खाना चाहते हैं बर्फ पर

उन्हें कमरों में धकेल दिया गया

असभ्य हो जाने के भय से


बच्चे चाहते हैं

रोना और हँसना खुलकर

पूछना चाहते हैं तारों का रहस्य

तुम्हारे खीझने पर चिल्लाना

गुस्सा होना भी चाहते हैं

बच्चे मगर डांट से वे सहमे रहे

छोटे बच्चे

माँ को सताना चाहते हैं

मचाना चाहते हैं ऊधम

घर-घर खेलना चाहते दिन भर

मगर भारी बस्ते लाद कर

उन्हें स्कूल भेजा गया



ऐसा ही समय रहा होगा



ठीक ऐसा ही समय रहा होगा

जब किसी ने अपने मित्र से

किया होगा

पहली बार विश्वासघात

स्त्रियाँ शालीनता भूल दौड़ पड़ी होंगी निर्वस्त्र

बाजारों की तरफ़

तरसे होंगे बुजुर्ग अपनी औलादों की सेवा को

आकाश में ऐसे ही समय सुराख़ हो गया होगा

बरसा होगा

मगर बूंदों में नहीं

सब जगह भी नहीं

कुछेक को ही मिला होगा

गला तर रखने को पानी

ज़हरीली हो गई होगी हवा

सभागार सुलग उठे होंगे

शवों की कतारों के बावजूद

शहर झूमते होंगे मदमस्त

बिंध जाती होगी आदमी की छाती

जानवर भय से थरथराते होंगे

राक्षस देवताओं पर टूट पड़े होंगे

ऐसा ही समय रहा होगा जब

समय ने स्वयं आ कर

बचाया होगा आदमी को।


विषय

कई मंजिला भवन के भीतर

एक साफ़ बड़े कमरे में

हीटर सेंकते लिख रहे होंगे आप

भूख के बारे में

जबकि आप बदहजमी का शिकार हैं

आप कल्पना करतें हैं एक झोंपडी

उसमें पति-पत्नी और

पाँच-छ: बच्चों की

जिनके पास खाने को कुछ नहीं

उसी समय आपके किचन में

बजती है प्रेशर कूकर की सीटी

देहरादून की भीनी खुशबू

आपका ख्याल तहस-नहस कर देती है

आप कमरे से बहार बालकनी में आ जाते हैं

और दूर-दूर तक नज़र आते हैं ऊचे भवन

कहीं कोई भूखा नहीं दिखाई देता

वापिस अपने टेबल पर आकर

फाड़ देते हैं कविता का कागज़

अब आप एक नया विषय सोच रहे हैं

शायद! बदहजमी कैसे दूर हो।

7 comments:

Shastri said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

-- शास्त्री (www.Sarathi.info)

Shastri said...

एक अनुरोध -- कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन का झंझट हटा दें. इससे आप जितना सोचते हैं उतना फायदा नहीं होता है, बल्कि समर्पित पाठकों/टिप्पणीकारों को अनावश्यक परेशानी होती है. हिन्दी के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में कोई भी वर्ड वेरिफिकेशन का प्रयोग नहीं करता है, जो इस बात का सूचक है कि यह एक जरूरी बात नहीं है.

वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिये निम्न कार्य करें: ब्लागस्पाट के अंदर जाकर --

Dahboard --> Setting --> Comments -->Show word verification for comments?

Select "No" and save!!

बस हो गया काम !!

शोभा said...

आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
bahut sundar likha hai. swagat hai.

संगीता पुरी said...

नए चिट्ठे के साथ हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है... आशा है आप अपनी प्रतिभा से चिट्ठा जगत को समृद्ध करेंगे.... हमारी शुभकामनाएं भी आपके साथ है।

नारदमुनि said...

pahli ball par huge sixser

Amit K. Sagar said...

उम्दा. जारी रहें;

रचना गौड़ ’भारती’ said...

स्वागत है.